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भागवत कथा चित्र नहीं चरित्र की पूजा सिखाती है:जन्मजय

आयुष साहू 9926141516:

श्रीकृष्ण की लीलाएं जीवन जीने की कला,सत्य का मार्ग,और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाती हैं:जन्मजय

भागवत कथा के माध्यम से भक्त केवल ईश्वर के रूप को नहीं बल्कि उनके आदर्श चरित्र को हृदय में बसाए:जन्मजय

भागवत कथा सुनने की सार्थकता तभी है जब हम इसके संदेशों को जीवन में उतारें:जन्मजय

सरायपाली/बसना- समीपस्थ ग्राम सागरपाली(बसना)में मुख्य यजमान गोपाल-सब्या,नरेन्द्र-सरिता,भगीरथी-भगवती,विरेन्द्र-रेवती,मुकेश-गीता एवं समस्त ग्रामवासियों के सहयोग से सप्त दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का आयोजन किया गया है।कथाव्यास देवराज मिश्रा के मुखारवृन्द से आस-पास,दूरस्थ अंचल से हजारों श्रद्धालु श्रीमद्भागवत कथा का आनंद उठा रहे हैं।कथा के षष्ठम दिवस वंदेमातरम् सेवा संस्थान छत्तीसगढ़ के उपाध्यक्ष,साहित्य साधक एवं ओजस्वी वक्ता जन्मजय नायक सम्मिलित हुए।इस अवसर पर व्यासपीठ के मंच से संबोधित करते हुए कहा-मानव जीवन कर्म प्रधान है और श्रीमद्भागवत कथा हमें सिखाती है कि संसार में रहते हुए कैसे कर्म करें।

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं जीवन जीने की कला,सत्य का मार्ग और अंत में मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है।नायक ने आगे कहा श्रीमद्भागवत कथा का मूल उद्देश्य और शिक्षा यही बताती है कि “चित्र नहीं चरित्र की पूजा होनी चाहिए।”भगवान का बाह्य रूप तो पूजनीय है,लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनके आदर्शों,लीलाओं और गुणों को अपने जीवन में उतारना है।श्रीमद्भागवत भागवत कथा के माध्यम से भक्त केवल ईश्वर के रूप को नहीं बल्कि उनके आदर्श चरित्र को अपने हृदय में बसाए क्योंकि धर्म में चित्र से अधिक चरित्र की प्रधानता बताई गई है।

अंत में नायक ने कहा “कथा श्रवण की सार्थकता तभी है जब हम इसके संदेशों को जीवन में उतारें और आत्मसात करें।”इस दिवस के कथा प्रसंग में भगवताचार्य देवराज मिश्रा जी ने भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की कथा बाललीला,56 भोग,विवाह उत्साह से जोड़ते हुए भक्ति के सागर में डुबकियाँ लगवाई तथा “माता-पिता भाई बंधु सखा वो हमारा है-कृष्ण नाम प्यारा है गोपाल नाम प्यारा है” भजन पर भक्तों को खूब थिरकाया।आयोजकों द्वारा महाभंडारे प्रसाद की समुचित व्यवस्था की गई थी।

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